
माफ कीजिए, यह शब्द सुनते नहीं हैं मेरी
इनके हाथों मुजरिम बन गए हैं हम
बस हथेलियाँ मेरी हैं
शब्द पराए हैं
किसी अनजाने कवि के साये हैं
बहते बहते कईं यादे बहती हैं उनकी
शौक से सुन लेते हैं हम
मुजरिम बनकर कुछ लिख भी लेते है
उस अदृश्य कवि का श्रेय भी लेते हैं हम.
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